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Tuesday, 29 July 2014

आज ऑफीस आते हुए...

आज ऑफीस आते हुए हायवे पर अपनी ही सोसाइटी की एक बीस इक्कीस साल की बच्ची को एक्टिवा पर साठ सत्तर की स्पीड से हवा मे बाल उड़ाते, एक हांथ से मोबाइल पर बात करते देखा और बेचैनी सी होने लगी, उसे इस तरह बेफिक्री से गाड़ी  चलाते देखकर डर लगने लगा, अपने छोटे भाई बहन की उम्र के इन बच्चों को ऐसी बेवकूफी करते देख सच में बड़ा ही बुरा लगता है.

एक तो हल्की बारिश हो रही थी और रास्ता पूरी तरह से गीला और घसरीला हो जाता है इस मौसम में और उपर से सिंगल हायवे और सुबह का बेदम ट्रॅफिक, किसी भी कारण से अगर ब्रेक लगाया तो गाड़ी का फिसलना तय है और ये बच्ची ना जाने क्या सोच कर एकदम बिंदास होकर ब्रेक छोड़ दाहिने हांत से मोबाइल बाएँ कान पर लगाकर बात करते हुए गाड़ी की स्पीड और बढ़ा रही थी.

ऑफीस पहुँचने तक मेरे दिमाग़ मे यही ख़याल दौड़ता रहा की.. माँ बाप ने बड़े प्यार से जो दुपहिया और मोबाइल दिया है क्या उसका सही इस्तेमाल हो रहा है? क्या ये सब उनको पता होगा?

इसी कश्मकश मे मैं ऑफीस पहुँचा और काम में व्यस्तता के कारण ये बात मेरे दिमाग़ से निकल ही गयी, शाम को ऑफीस मे काफ़ी लेट हो गया था, बारिश अब भी ज़ोरों पर थी, भीगता हुआ मैं आधे घंटे मे घर पहुँचा तो पता चला की वही बच्ची जिसको सुबह देखा था, उसका एक्सीडेंट हो गया है, पावं मे फ्रॅक्चर और सिर पर थोड़ी गहरी चोटें आई हैं. ये सुनकर मन ही मन खुद को कोसने लगा की अगर रुक कर उसे संभल कर ड्राइविंग करने को कहता तो शायद ये एक्सीडेंट ना होता. कुछ बातें आपके दिल में बहुत गहरा असर करती हैं, आप की ग़लती ना होते हुए भी आप अपने आप को ज़िम्मेदार समझने लगते हो.

मैं तो हमेशा ही अपने छोटे भाई के कान नोंचता रहता हूँ की गाड़ी चलाते समय मोबाइल का इस्तेमाल ना करे और सामान्य गति से गाड़ी चलाए, चिंता लगी रहती है उसकी हमेशा... घर से निकलता है तो गाड़ी अस्सी की स्पीड मे तो होती ही है फिर वो ये नही देखता की इधर उधर से क्या आ रहा है. मेरे सामने तो अब वो ऐसा नही करता शायद मेरे पीछे करता हो? लेकिन मुझे ये नही समझ आता की गाड़ी चलाते हुए फोन पर बात करना आख़िर इतना ज़रूरी क्यूँ है? दो मिनिट साइड मे रुककर या जहाँ जा रहे हैं वहाँ पहुँच कर बात करने मे क्या जाता है? सबकुछ भुलाकर अस्सी नब्बे की स्पीड में दुपहिया चलाते हुए फ़ोन पर बात करने के लिए आजकल के बच्चों को आख़िर इतना ज़रूरी क्या काम होता होगा?

हम भी उस समय से गुज़रे हैं लेकिन जहांतक मुझे याद है हमने तो कभी ऐसा नहीं किया, घर पे माँ बाप बेफ़िक्र हैं इसका मतलब ये तो नही की आप भी बेफ़िक्र रहो, एक्सीडेंट्स को आमंत्रण ना दो, गाड़ी चलाते हुए फोन का इस्तेमाल ना करो तो ही बेहतर है.

(11 - 06 - 2014 को लिखा गया)

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