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Friday, 25 July 2014

कुछ बात तो ज़रूर है इनमें.

रात के हेवी हॅंगओवर के बाद आज मैं दस बजे उठा तो न्यूज़ मे देखा कुछ अनकूल और नीरस लोगों ने फिर देश के लिए कुछ मेडल जीते  हैं और हँसी आ गयी, सोचा क्या पागल लोग हैं एक मेडल के लिए पागलों जैसे इधर उधर भागते रहते हैं, मैं तो आराम से घर बैठे ऑर्डर कर के गोल्ड मेडल बनवा सकता हूँ, इन लोगों को तो और कोई काम ही नही है, मेडल वेडल जीत कर ये लोग न्यूज़ चैनलों पर आते हैं और हमारी चटपटी खबरों की वाट लगा देते हैं. फिर नींद से सनी आखों को मसलते हुए मैने चैनल बदला तो पाया की हर न्यूज़ चैनल यही सब बकवास दिखा रहा है, सोचा की ये बकवास न्यूज़ देखने से अच्छा तो मैं वापस सो ही जाऊं. एक सिगरेट जलाकर मैं थोड़ी देर और हंसा, एक दो दोस्तों को फोन कर के आज रात की पार्टी का प्लान बनाया, बूज़ शूज़, वीड शीड और बियर शियर मे नहाने का प्लान.

इतनी बोरिंग न्यूज़ देखकर भी जब सोफे से उठने का मन नही किया तो सोचा की चलो अब देख ही लेते हैं कितने मेडल मिले हमे और आख़िर लोगों को मेडल जीतकर क्या मिल जाता है?

ज़्यादा कुछ दिमाग़ मे आया नही, एक तो बोरियत से भरी न्यूज़ और उपर से रात का हॅंगओवर और आँखों मे अब भी छाई हुई नींद. आख़िर सोचता भी क्या, देश के लिए मेडल जीतना इस सो ओल्डफॅशन यू नो... फिर लगा कि क्यूँ ना आज रात की पार्टी मे आने वाली लड़कियों के बारे मे सोचा जाए और फ़ायदा क्या है इन लोगों को देखकर, इनके बारे मे सोचकर क्यूँ की आगे चलकर इन लोगों ने पानी पूरी बेचनी है या फिर पान या फिर किराने की दुकान ही चलानी है.

बड़े मेडल जीते हैं इन्होने देश के लिए लेकिन कितने बदनसीब हैं ये लोग जो कभी हमारी तरह ज़िंदगी एंजॉय नही कर पाए, हम तो हमेशा मस्त रहते हैं, चार बोतल वोड्का, पाँच बोतल विस्की और एक दो पैकेट सिगरेट और फिर थोड़ा सा वीड... लेकिन ये लोग तो बड़े ही बेकिस्मत हैं जो जिंदगी के इन सब मज़े, एशोआराम से वंचित हैं, कभी कभी तो तरस आता है इन लोगों पर, हँसी भी आती है कभी कभी... एक दो मेडल जीतकर इन्हे लगता है की इन्होने बड़ा तीर मार लिया...हाहा लेकिन हमारे जैसे दस पटियाला पेग मारने मे तो ये हमेशा असफल रहेंगे.

मेरे पापा पर भी ऐसा ही ज़ुनून सवार रहता है, वो अक्सर कहा करते हैं की उन्हे भी सौ मीटर दौड़ मे ओलिंपिक जीतना था और मैं हमेशा यह कहकर उनका मज़ाक उड़ा देता कि "ये सब बकवास है इससे अच्छा आप घर बैठे लॉटरी ख़रीदकर जीत जाइए, दोनों मे जीतने की प्रॉबबिलिटी ऑलमोस्ट सेम है"... लेकिन आज ख़याल आया की आख़िर पापा को मेडल जीतने की ख्वाहिश क्यों थी? और आँखे थम गयी उन कुछ चेहरों पर, मैने गौर से देखा उन चेहरों को... जो मेडल गले मे झुलाए मुस्कुरा रहे थे और खुशी के मारे फूले नही समा रहे थे, उनके चेहरे पर एक अजीब ही रौनक थी मानो दुनिया जीत ली हो उन्होने, उनकी आँखों मे जीत की चमक साफ साफ नज़र आ रही थी और मेरी आँखों की नींद भी धीरे धीरे उड़ सी रही थी, ऐसा लग रहा था मानो उन्होने अपनी जिंदगी का फितूर पूरा कर लिया हो, एक ज़ुनूनी मुस्कान लहरा रही थी सबके चेहरों पर.

वो क्या है जो इन लोगों को देश के लिए मेडल जीतने को प्रेरित करता है, वो क्या है जो इन लोगों को देश का नाम उँचा करने पर मजबूर करता है, आख़िर वो क्या है इनमे जो हम जैसे खुद को हाइ क्लास समझने वाले लोगों की नज़र मे नही आता, आख़िर वो क्या है इनमे जो देश के लिए मेडल जीतकर भी इन्हे गुमनामी में खो जाने को प्रेरित करता है, ये सब देख कर इतना तो जान गया था की पापा को मेडल जीतने की ख्वाहिश क्यों थी लेकिन ये नही जान पाया की आख़िर वो क्या बात है जो इनसे इतनी मेहनत करा कर इन्हे वहाँ तक ले जाती है, कुछ ऐसा नही दिखा जो अलग लगा हो, फिर भी सवाल तो अब वही था की कुछ बात तो ज़रूर है इनमें और वो क्या बात है इनमे जो मेरी, तुम्हारी, हम सबकी नज़र में नही आती? शायद मेडल जीतने पर मिलने वाला सम्मान उनसे ये सब करवाता हो? शायद. बड़ा दिमाग़ चलाया और बड़ी देर तक सर पटका तो जवाब भी बस वही था की कुछ बात तो ज़रूर है इनमें.


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