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Tuesday, 14 October 2014

लौट रहा हूँ आज फिर

लौट रहा हूँ ऑफिस से घर की तरफ
आज फिर थका हारा सा हूँ
मायूसी और ख़ामोशी ने जकड़ सा रखा है।
कुछ पंछियों के झुंड भी हैं
जो मेरी गाडी के साथ साथ उड़ रहे हैं
आसमान में कलाबाजियां कर रहे हैं
शायद वो भी घर की तरफ़ ही लौट रहे होंगे
लेकिन वो चिहुचिहा रहे हैं
एक दुसरे के साथ खेल रहे हैं
थके हुए तो बिलकुल भी नहीं लगते मुझे
लग रहा है की ज्यादा फर्क नहीं है हममे
मैं भी तो बस उन्ही की तरह हूँ
सुबह निकलता हूँ घर से उन्ही की तरह
शाम को लौटता भी हूँ उन्ही की तरह
लेकिन फिर भी मुझे ख़ुशी क्यों नहीं है घर लौटने की?
वो खुश लग रहे हैं
मेरे चेहरे पे ख़ामोशी है
वो खिलखिला रहे हैं
मेरे चेहरे पर मायूसी है
वो क्यों खिलखिला रहे हैं?
मैं क्यों मायूस हूँ?
क्या वजह है जो वो शोरोगुल से उड़ रहे हैं?
और मैं इतनी ख़ामोशी से लौट रहा हूँ?
शायद आज मौसम अच्छा है इसलिए वो खुश होंगे।
तो फिर मेरे चेहरे पर ये मायूसी कैसी?
आखिर क्या बात है जो मैं नहीं जान पा रहा?
सोचता हूँ कुछ देर आखिर क्या बात है।

हाँ शायद अब मैं समझ गया।
मेरा झुंड कहाँ है?
वो अपने परिवार के साथ हैं।
और मैं अकेला हूँ यहाँ, घर से इतनी दूर
जहाँ जा रहा हूँ वो तो सिर्फ एक मकान है
घर तो कहीं और है।
मैं सही था सच में कोई फर्क नहीं है हममे
मैं भी घर जा रहा होता तो,
शायद ऐसे ही खिलखिला रहा होता।

सच में, कोई ज्यादा फर्क नहीं है हममे और उन पंछियों में।
वो उड़कर घर को लौट जाते हैं
और हम उड़ान भरते हैं तो घर से दूर हो जाते हैं, बहुत दूर।

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